
खामोशी का गीत गुनगुनाना चाहता हूँ
दुनिया की भीड़ से दूर जाना चाहता हूँ
जो कहानी बचपन में थी सुनी
उन परियों को छूना चाहता हूँ
घुटन होने लगी अपनी ही परछाई से
इस नकाब को उतारना चाहता हूँ
दौड़ते-भागते थक गया इस शहर में
अब तीतलियों के पीछे भागना चाहता हूँ
वो गलियाँ,वो कूंचे,वो बारिश की पहली बूँद
गौतम,अपने बचपन को फिर से जीना चाहता हूँ.....
1 comment:
titliyan and pariyan .. Note Kiya jaye.. Jokes apart.. Kafi mast likhte ho aap
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