रिश्ते








रिश्ते
भी अजीब होते हैं ,
कुछ स्याह काली रातों की तरह,
जहाँ हाथ को हाथ नहीं सूझता,
कुछ शीशे की तरह साफ़ ,
जहाँ सब-कुछ आर-पार दिखता है,
मैं ने देखा है सिसकते हुए रिश्ते,
कुछ घिसटकर चलते हुए रिश्ते,
सफ़ेद बूत की तरह पड़े हुए रिश्ते,
टूटे काच की तरह बिखरे रिश्ते,
मौसम की तरह आते-जाते रिश्ते,
ओस की पहली दूंद की तरह रिश्ते,
चटकीली धुप की तरह रिश्ते,
हर मोड़ पर बनते बिगड़ते हैं रिश्ते,
पर जिन्दगी का आधार हैं यह रिश्ते,
क्या जिन्दगी के बाद भी रहते हैं रिश्ते?

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