माँ

मेरे सपनों की ऊँचाई है,
मेरे विचारों की गहराई है,
मेरी भावनाओं की संवेदना है,
मेरी प्रेरणा का प्रवाह है,
मेरे संस्कारों की आधारशिला है,
मेरे डगमगाते क़दमों का संबल है,
मेरी तपस्या की साधना है,
मेरे सर्वस्व की पहचान है,
तू जननी है,तू माँ है|

घुटन










सबकुछ
तो है मेरे पास,
बस आँखों में नींद नहीं है,
विलासिता की वस्तुएं हैं,
पर आराम नहीं है,
पैसों की चमक है,
पर ख़ुशी नहीं है,
जिन्दगी तो है,
पर मुस्कान नहीं हैं|

नववर्ष









कुछ
भी तो नहीं बदला,
सबने एक-दूसरे को,
नववर्ष की शुभकामनाएं दीं,
कुछ मदिरापन हुआ कुछ केक कटे,
मोमबत्तियां जली और पटाखे छुटे,
पर दिल के भेद नहीं मिटे,
रात बीती और सुबह हुई,
बस कैलेण्डर बदल डाला|

रिश्ते








रिश्ते
भी अजीब होते हैं ,
कुछ स्याह काली रातों की तरह,
जहाँ हाथ को हाथ नहीं सूझता,
कुछ शीशे की तरह साफ़ ,
जहाँ सब-कुछ आर-पार दिखता है,
मैं ने देखा है सिसकते हुए रिश्ते,
कुछ घिसटकर चलते हुए रिश्ते,
सफ़ेद बूत की तरह पड़े हुए रिश्ते,
टूटे काच की तरह बिखरे रिश्ते,
मौसम की तरह आते-जाते रिश्ते,
ओस की पहली दूंद की तरह रिश्ते,
चटकीली धुप की तरह रिश्ते,
हर मोड़ पर बनते बिगड़ते हैं रिश्ते,
पर जिन्दगी का आधार हैं यह रिश्ते,
क्या जिन्दगी के बाद भी रहते हैं रिश्ते?

खामोशी








खामोशी का गीत गुनगुनाना चाहता हूँ
दुनिया की भीड़ से दूर जाना चाहता हूँ
जो कहानी बचपन में थी सुनी
उन परियों को छूना चाहता हूँ
घुटन होने लगी अपनी ही परछाई से
इस नकाब को उतारना चाहता हूँ
दौड़ते-भागते थक गया इस शहर में
अब तीतलियों के पीछे भागना चाहता हूँ
वो गलियाँ,वो कूंचे,वो बारिश की पहली बूँद
गौतम,अपने बचपन को फिर से जीना चाहता हूँ.....

वजूद










दीन
भर दुनिया की भीड़ में,
उस कोलाहल की हल्दीघाटी में,
अपना वजूद कायम रखने की कोशिश में,
हर रोज महाराणा की हार होती है,
अकबर के हाथों,
स्वाभिमान का चेतक घायल होता है,
हारता नहीं,
फिर लौट आता है,
नयी सुबह में नए संगग्राम के लीये|